#जीवन-स्तंभ

रक्षा के बंधन में धागों से बँधकर जीवन का स्तंभ बन जाते हैं भाई… !!! हर संभव मुस्कान की आभा बिखेरते जीवन का मोहक चित्रांकन मेरे भाई… !!! बचपन की स्निग्ध स्मृतियों की अनुभूति प्यार और दुलार की फुहार मेरे भाई… !!! प्रार्थना-सी पावन है इनकी शुभेच्छा स्नेह की गहराई मेरी परछाई मेरे भाई … […]

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#चाहत…

उन मग़रूर निगाहों के रेशों से उलझकर इश्क मेरा गुमनाम हुआ… वो चाहत के महीन धागों को एक बार आहिस्ता से सुलझा कर तो देखें … #काव्याक्षरा

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#पत्रकारिता_का_बदला_रूप

अखबारों की सुर्खियाँ और मीडिया का बड़बोलापन समाज का असली चेहरा है या मात्र चैनल का विज्ञापन… पत्रकारिता यूँ तो है कर्त्तव्यों का अग्निपथ लालसा प्रभुत्व की, कर देती मगर विशुद्धता व्यर्थ … जीवन के हर पहलू पर अब मीडिया का हस्तक्षेप सत्योद्घाटन कर रहा है मूल्यों पर सीधे आक्षेप… क्या नया और क्या अलग […]

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#बेवजह की तिश्नगी…

यूँ जिंदगी में गैरवाज़िब मोड़ आ जाते हैं जब बेवजह की तिश्नगी-से लोग आ जाते हैं….! लिए बेतुकी-सी चाहतें किरदार से अजब हैं हक जताने के मसले का अंदाज़ भी गज़ब है… ! कभी लफ्ज़ों की दीवानगी कभी अदा से मुहब्बत कभी सोच पर फ़िदा हैं कभी दोस्ती की चाहत…! समझना नामुमकिन ये चल क्या […]

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#पिताजी…

#Happy_Father’s_Day पिताजी नाम की शख़्सियत का हमारे बचपन के ज़माने में गज़ब का रुआब था… कुछ पिताजी के हौसले तो कुछ ज़िंदगी की माकूल सादगी का कमाल था… वे चंद कमाए हुए पैसों से पूरे परिवार की ज़रूरतों को चुटकियों में समेट लेते थे… उनके चेहरे के हाव-भाव से हम अपने अरमानों का उतार-चढ़ाव तय […]

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#आखिर_कब_तक

आखिर कब तक वो गुनाहों की हद तक जाएँगे बदनीयत इंसानियत कुचलते जाएँगे… आखिर कब तक वो वहशत का कहर दिखाएँगे बेजुबान मासूमों पर ज़ुल्म ढाएँगे आखिर कब तक दरिंदगी के निशां बनाएँगे वो गुनाहों के मंज़र दोहराते जाएँगे… आखिर कब तक हम जलालत को सहते जाएँगे यूँ बेबस होकर एहसासों का मातम मनाएँगे… #काव्याक्षरा […]

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#मन्नत

मेरी जान ! तेरे सद़के… क्या-क्या ना वार दूंँ… ! मुस्कान पर मैं तेरे खुद को निसार दूँ… ! हर साँस पर मैं तेरी मन्नत हजार लूँ…! हर व़क्त साथ चाहूँ जीवन संँवार लूँ…! हमराही ज़िंदगी में तेरा साथ कीमती है… ! दमके जो तेरा चेहरा नज़रें उतार लूँ…! एक पल में तेरे बिन है […]

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