चलो! हम खुद ही खुद से रूठकर मना लेते हैं ख्वाह म ख्वाह अपनों को तकलीफ़ क्या देनी ✍️ काव्याक्षरा

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एक कत़रा धूप… संभवतः कभी बिन-बुलाएखिलकर आएस्नेह की ऊष्मा सेमुझे सराबोर करनेवो… एक कत़रा धूप मेरे हिस्से की धुंध कोपिघलाकर ले जाएन कतराएचमचमाकर आएचाहे मुट्ठीभर ही… छाए धूप जब गुनगुनी-सी तपन बनखिलखिलाए किसी क्षणअंतर्मन तकसहला जाएमुस्कराती… चपल धूप तो ऊष्मित होंजड़ हुए विचारमन को दे सरल विस्तारआलिंगन को आतुरझुठलाती हुई… प्रेमिल धूप पिघलें दर्प की […]

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यहाँ मेरे शब्दों का अर्थ नौकरी के प्रति नकारात्मक सोच रखना नहीं है क्योंकि नौकरी से हम आत्मनिर्भर तो बनते ही हैं, ये हमें पूर्णता का अनुभव भी कराती है।इसके माध्यम से हम समाजिक हित से सरोकार रखते हैं और क्रियाशील रहते हुए निरंतर व्यक्तित्व का विकास करते हैं! ✍️#काव्याक्षरा

Read More यहाँ मेरे शब्दों का अर्थ नौकरी के प्रति नकारात्मक सोच रखना नहीं है क्योंकि नौकरी से हम आत्मनिर्भर तो बनते ही हैं, ये हमें पूर्णता का अनुभव भी कराती है।इसके माध्यम से हम समाजिक हित से सरोकार रखते हैं और क्रियाशील रहते हुए निरंतर व्यक्तित्व का विकास करते हैं! ✍️#काव्याक्षरा

ज़िंदगी का क्वेश्चन पेपरक्यों आउट नहीं होता रिपीट होता है अक्सरसबकी ही ज़िंदगी में तकरीबन एक जैसाहर एक प्रश्न होता है सॉल्यूशन फिर न जानेक्यों एक-सा नहीं होता… ✍️#काव्याक्षरा

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